नारी का सम्मान ही, पौरूषता की आन

  1. नारी का सम्मान ही, पौरूषता की आन,
    नारी की अवहेलना, नारी का अपमान।

    मां-बेटी-पत्नी-बहन, नारी रूप हजार,
    नारी से रिश्ते सजे, नारी से परिवार।

    नारी बीज उगात है, नारी धरती रूप,
    नारी जग सृजित करे, धgर-धर रूप अनूप।

    नारी जीवन से भरी, नारी वृक्ष समान,
    जीवन का पालन करे, नारी है भगवान।

    नारी में जो निहित है, नारी शुद्ध विवेक,
    नारी मन निर्मल करे, हर लेती अविवेक

पिया संग अनुगामिनी, ले हाथों में हाथ,
सात जनम की कसम, ले सदा निभाती साथ।

हर युग में नारी बनी, बलिदानों की आन,
खुद को अर्पित कर दिया, कर सबका उत्थान।

नारी परिवर्तन करे, करती पशुता दूर,
जीवन को सुरभित करे, प्रेम करे भरपूर।

प्रेम लुटा तन-मन दिया, करती है बलिदान,
ममता की वर्षा करे, नारी घर का मान।

मीरा, सची, सुलोचना, राधा, सीता नाम,
दुर्गा, काली, द्रौपदी, अनसुइया सुख धाम।

मर्यादा गहना बने, सजती नारी देह,
संस्कार को पहनकर, स्वर्णिम बनता गेह।

पिया संग है कामनी, मातुल सुत के साथ,
सास-ससुर को सेवती, रुके कभी न हाथ।

  • ” यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमन्ते तत्र देवता” – आदि शक्ति स्वरुपा माँ की प्रतिनिधि के रुप में अपने दायित्वों के क्रम में सतत व निष्काम भावना से ओत- प्रोत आपकी क्रियाशीलता के प्रति कोटि

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